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सुलक्षणा पंचतत्व मे विलीन हो रही थी …..

सुलक्षणा पंचतत्व मे विलीन हो रही थी। आग की लपटों ने उसको अपने आग़ोश मे ले लिया था। उसके जलने के साथ ही उसके और अमोल के सपने भी धू-धू कर पंचतत्व मे धुआँ हो रहे थे। इतना बड़ा दुख कोइ कैसे सहन कर पाता है ये ईश्वर ही जाने। शायद दुख के साथ हिम्मत भी ऊपर वाला देता है। पर ऐसा दुख ईश्वर देता ही क्यों है समझना मुश्किल होता है। आज सुबह की ही तो बात थी दोनो कितने खुश थे हॉस्पिटल जाते हुये आखिर उनके प्यार की निशानी आने वाली थी। जिसका इन दोनो पति-पत्नि के अलावा घर वालों को भी बहुत इंतज़ार था। कुल मिलाकर ऐसा जैसे कोई परदे पर चलने वाली स्टोरी हो।

अलग-अलग छोटे शहरो से पढने और कुछ बनने के लिये बड़े शहर आये सुलक्षणा और अमोल कैसे अचानक मिले और फिर एक दूसरे के साथ जीने-मरने की क़समें खाते हुये अपने सपनों को साकार करने के लिये जुटे रहे। एक लम्बा समय बीत गया बहुत सारे उतार-चढ़ाव ज़िंदगी मे आये लेकिन दोनो एक दूसरे का सम्बल बन डट कर कर मुक़ाबला करते रहे। सुलक्षणा और अमोल ने वो मुक़ाम हासिल कर लिया जो वो करने के लिये घरों से निकले थे। अब इंतज़ार था तो सामाजिक रूप से एक होने का। दिल -दिमाग से जाने कब का एक दूसरे के हो चुके थे। सुलक्षणा अक्सर प्यार मे खो कर अमोल से कहती मेरा मन करता है मै बादलों मे खेलू वहाँ से तुमको देखूँ।

आखिर वो दिन भी आया जिसका इन दोनो प्रेमियों को तेरह सालों से इंतज़ार था। आज सुलक्षणा दुल्हन बनी थी और अमोल दूल्हा दोनो के अरमानों को जैसे पंख लग गये थे। सुलक्षणा सजी-धजी बेहद सुंदर लग रही थी तो अमोल भी किसी मॉडल से कम नही लग रहा था। खूब धूम-धाम से शादी हुई सुलक्षणा अब विदा होकर अमोल के घर पहुँच चुकी थी। दोनो तरफ का पूरा घर-परिवार खूब खुश थे। दोनो की गृहस्थी की गाड़ी चल पड़ी। दोनो ने एक आशियाना लिया और अपने सपनों का आबाद करने लगे।

दोनो रात मे जल्दी-जल्दी सोने चले गये सुबह डॉ० ने डिलेवरी की डेट दी थी। दोनो खुश थे। हॉस्पिटल पंहुचे डॉ ने ऑपरेशन की तयारी की। सुलक्षणा घबराते हुये अंदर गयी। अमोल ने उसको साहस दिया समझाया हालाँकि डर तो अमोल भी रहा था लेकिन कही न कही नये मेहमान का इंतज़ार भी था। सुलक्षणा को ऑपरेशन करने के लिये एनेस्थीसिया दिया गया ।एनेस्थीसिया देते ही सुलक्षणा की हालत बिगड़ी और बिगड़ते-बिगड़ते हालात इतने नाज़ुक हो गये कि सुलक्षणा को वेंटिलेटर पर रखना पड़ा।

हालात बेहद नाज़ुक हो चुके थे। इस बात को अमोल समझ चुका था डॉ० से लड़-झगड़ कर वह सुलक्षणा के पहुँच गया … सुलक्षणा का दिल कभी ज़ोर से धड़कता तो कभी बिलकुल धीमे ,मुँह मे ऑक्सीजन लगी हुई थी अमोल ने जब कहा घर चलना है न! सुलक्षणा ने हल्के से इशारे मे हामी भरी थी। पर अमोल अनहोनी को समझ रहा था। काफ़ी देर इंतज़ार के बाद दूसरे हॉस्पीटल ले गये एम्बुलेंस मे भी अमोल उसको बार-बार बोल रहा था तुम्हें कुछ नही होगा हम जल्दी घर चलेंगे। पर होनी को कौन टाल सकता था। हालात नाज़ुक थे लेकिन डॉक्टर्स ने ऑपरेशन कर बच्चा निकलना सही समझा। बच्चा निकाला गया जो कि पहले ही दुनिया मे आने से पहले ही दुनिया छोड़ चुका था।

इसके साथ ही सुलक्षणा की हालत इतनी बिगड़ी कि बच्चे के साथ- साथ खुद भी दुनिया छोड़ चली। दोनो के प्यार की निशानी मरे हुये बच्चे को नर्स ने अमोल की गोद मे थमाते हुये बोली सुनिये सॉरी आपका पेसेन्ट नही रहा क्या आप पोस्टमार्टम कराना चाहेंगे …अमोल को जैसे कुछ सुनायी न दे रहा हो वह अपनी गोद मे मरे हुये बच्चे को देखा और नर्स को कुछ बोल नही सका। जैसे – तैसे सगे संबंधियों ने अमोल को संभाला।

अब सुलक्षणा अपने अमोल और बेटे के साथ उस घर जा रही है जहाँ कभी वह ज़िंदगी भर अमोल के साथ रहने को गाजे-बाजे के साथ सजी-धजी हुई बहु बनकर आयी थी । अमोल पथरायी आँखों से पूरा रास्ता ताके जा रहा था। सुलक्षणा अपनी ससुराल पहुँच चुकी है। अंतिम संस्कार के लिये उसे तयार किया जा रहा है। उसे नहलाया जा रहा है सोलह श्रृंगार किया जा रहा है बग़ल मे उसका बच्चा भी लेटा है जैसे दोनो सोने का नाटक कर रहे हों। देखने वालों की आँखें थम नही रही थी। अमोल शून्य हो खड़े सब देख रहा था।

अब अमोल को आख़िरी बार देखने और सुलक्षणा का सुहाग करने के लिये पास बुलाया गया … अमोल ने सुलक्षणा की माँग मे सिन्दूर डाला, बिंदी लगायी, चुनरी ओढ़ाया इसके साथ ही सुलक्षणा और बच्चे को अंक मे भर फ़फक -फफक कर रो पड़ा। हे! ईश्वर प्यार करने वाले को ऐसे क्यों जुदा किया एक हँसते- खेलते परिवार की सारी ख़ुशियाँ पल भर मे दफ़्न कर दी। अमोल और सुलक्षणा का अधूरा प्यार शायद आसमान मे कही विलीन हो गया। क्योंकि अमोल अब अक्सर आसमान की ओर देख कर बातें करता रहता है। शायद सुलक्षणा की बादलों के पार अमोल को देखने वाली बात सही हो गयी थी। शायद सुलक्षणा अपने बच्चे के साथ बादलों के पार अमोल को ही देखती होगी।

– शशि पाण्डेय (नई दिल्ली)
(लेखिका हास्य-व्यंग्य की श्रेष्ठ रचनाकार है।)

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