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सावन की बूंदों को मोती बना दूं ….

सावन की बूंदों को मोती बना दूं,
बरखा का आंचल मैं तुझको उढा दूं,
सताने के कैसे मैं ढूंढूं बहाने,
मौसम की कैसे मैं तुझको सजा दूं।

रातों को चन्दा भी दिखता नहीं है,
बादल का घोड़ा भी हटता नहीं है,
करूं क्या उपाय जो बहले मेरा दिल,
कटाए मुआ वक्त कटता नहीं है।

कोयल भी भूली मधुर राग अपना,
आने का वादा हुआ तेरा सपना,
हो सावन घनेरे या भादों के मेले,
छोडूं मैं कैसे तेरा नाम जपना।

                                             – नीलू शुक्ला मिश्रा
                             (लेखिका वरिष्ठ कवियित्री है।)

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