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||  बारीआम के आम  ||

"जननी जन्मभूमश्चि  स्वर्गादपि गरियसि"

अपनी जन्मभूमि की मिट्टी की सौंधी गन्ध कभी विस्मृत हुई है भला! हर मौसम हर सुबह हर शाम डायरी का एक सफ़ा है,..ज़रा सी हवा सहलाती है और एक सरसराहट सी होती है,..और यादों का एक खरगोश सरपट दौड़ने लगता है उन साफ-सुथरी,शफ्फाक सड़कों पर जिसे पकड़ने मेरा मन उससे भी तेज तेज भागता है,..और उसके खड़े कान आख़िर मेरे हाथ में आ ही जाते हैं,.जिन्हें मैं उमेठ देती हूँ और खुल जाती है डायरी में से मुस्कुराती  एक रसभरी कहानी,..आप भी सुनिए—

मध्यप्रदेश का एकमात्र पर्वतीय स्थल पचमढ़ी,..जिसे सतपुड़ा की रानी भी कहा जाता है। समुद्रतल से 14 हज़ार फुट की ऊँचाई पर सतपुड़ा के घने जंगलों की गोद में बसा छोटा सा प्यारा सुंदर कोमल शिशु जैसा निर्दोष मृगछौना जिसे मानो वनदेवी ने अपनी गोदी में बिठा रक्खा है।
मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा का कृपापात्र होशंगाबाद जिला जहाँ इलाहाबाद की तर्ज़ पर सतरस्ता बनाया गया है,..इस सतरस्ते से गुज़रते हुए सीधे दाहिने मोड़ पर मुड़कर एक चौड़ी सड़क आ जाती है और मस्त होकर दौड़ती है इस पर दौड़ता है सारा होशंगाबाद और इसी पर 100मीटर दौड़कर आ जाता है एक विशालकाय पुल जो होशंगाबाद का प्रवेश द्वार हो जैसे झूमते गजराज की तरह सूंड उठाकर स्वागत करता प्रतीत होता है। पुल से नीचे झाँकने पर तरबूज ही तरबूज बिछे दिखते हैं। यहाँ का सर्वसुलभ और सबकी जेब के दायरे में आ जाने वाला शीतल पेय यहाँ के तरबूज संकर प्रजाति के न होकर ठेठ देशी है,.अतः इन पर धारियाँ न होकर काई सा गहरा हरा रंग पूरा प्लेन ही होता है।
नर्मदा के कछार में पान के बरहेजे जिनकी बेलों की शीतल छाया में परमल की खेती होती है। इन बरहेजों में लगे परमल की सब्ज़ी जिसने खाई है स्वाद वही महसूस कर सकता है ऐसे कैसे बता दूँ उसके लिए आपको नर्मदा के कछारों में उतरना पड़ेगा।और इन तरबूजों की कतारों पर अगर काटे हुए तरबूज की एक एक फ़ाँक भी रख दी जाये तो हूबहू वही नज़ारा होगा जिसे आप लाल किले पर 26 जनवरी को हेलीकॉप्टर से लिए फ़ोटो शूट से देखते हैं। परेड की सलामी के बाद सिक्खों की टुकड़ी के दृश्य का नज़ारा हो जैसे—-

उसी होशंगाबाद  के पास बसा कस्बा पिपरिया जो अब विस्तार पा रहा है और जिले की एक बड़ी अनाज मण्डी बन चुका है,..पचमढ़ी उसकी छोटी दुलारी बहन है,और वो बड़े रुआब से कहने की हिम्मत रखता है कि पचमढ़ी तक पहुँचने के लिए तुम्हें मुझसे होकर गुज़रना पड़ेगा जी हाँ कोई भी पिपरिया से होकर ही पचमढ़ी की सरहद को छू सकता है। इसी के रेलवे स्टेशन पर उतर कर आप सतपुड़ा की रानी तक पहुँच सकते हैं वो भी 54 किलोमीटर का सड़क मार्ग जिसमें 27 किलोमीटर के रास्ते में मोड़ ही मोड़ हैं को पार कर आप यहाँ पहुँच सकते हैं। यहाँ जब पिपरिया से निकल कर मटकुली तक का सफर तय होता है,.तो हवाओं का तापमान अधिक रहता है,…आँखें मूंदकर बैठे हुए भी जैसे ही एक मदहोश कर देने वाली ख़ुशबू ज़ेहन में क़दम रख दे तो पता चल जाता हैं मटकुली की सीमा पार कर ली है हमारे वाहन ही नहीं मन ने भी और कानों की लौ को ठण्डी हवा हौले से चूम ले तो हमारी मुंदी आँखें खुद-ब-खुद खुलने लगती हैं,बहन की दिमाग़ी तासीर शीतल है,.जहाँ भाई मई जून में तमतमाता रहता है,..बहन कहती है ठण्ड रख अरे और ये ही तो दिन हैं बहार के,जब नए नए जोड़े शादी होते ही यहाँ अभिसार के लिए बेताब हुए दौड़े चले आते हैं,वहीँ पढ़ पढ़ कर उकताए बच्चे और टिफिन बना बना कर अघाई मम्मियाँ ऑफिस कॉलेज से जान छुड़ा कर भागे पापा लोग सब कुछ भूल कर भवानीप्रसाद मिश्र की कविता….सतपुड़ा के घने जंगल ऊंघते अनमने जंगल गाने चले आते हैं।

आज से तीन दशक पहले की पचमढ़ी बदलने लगी है,..एक उत्तर आधुनिक युवती की तरह उसकी पोशाक भी अब मॉडर्न हो चली है,..और अब पर्यटको और स्थानीय युवक युवतियों की पोशाकों और जीवन शैली में कोई भेद नहीं रहा,..एक फ़र्क़ है यहाँ के पढ़े लिखे लोग बहुत स्पष्ट खड़ी बोली बोलते हैं,.यहाँ की सकरी सड़कें अब गाड़ियों से अटी पड़ी हैं। पचमढ़ी विकास प्राधिकरण और मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग की सर्वसुविधायुक्त होटल्स के अलावा निजी होटल्स की भी भरमार है,..आज से तीन दशक पूर्व अधिकांश पॉइंट्स पर पैदल ही घूमने जाया करते थे अब गाड़ियाँ हैं तो एक ही दिन में कई पॉइंट्स देखे जा सकते हैं।

गाड़ी में आप विंडो सीट पर हैं तो ये एक सुअवसर है,..अपनी आँखें दूरबीन की तरह बाहर गड़ा दीजिये,..इतने घने और हरे वृक्ष आपने नहीं देखे होंगे खड़े पहाड़ इस हरी झालरदार पोशाक में बड़े मोहक लगते हैं। क़ुदरत ने पतझड़ का मौसम यहाँ फटकने तक नहीं दिया है,..किसी भी ऋतु में यहाँ वृक्ष अनावृत नहीं होते।बड़े पत्ते पीले हों उससे पहले ही इनके बीच से बारीक़ लाल लाल पत्ते फूट आते हैं और इतनी ज़ल्दी युवा होते हैं जबकि पेरेंट पत्ता भी अच्छी कन्डीशन में होता है,.जैसे दो सुंदर स्त्रियाँ जो माँ बेटी हैं उन्हें कोई मनचला देखकर कहे वाह जी दो बहनें बैठी है और पेरेंट पत्ता नवपल्लवित पत्ते की आड़ मेंशर्मा कर मुंह छुपा ले।
इन्हें देखते जी नहीं भरता कि नीचे नज़र डालो तो चाँदी की एक रेखा गाड़ी के साथ साथ दौड़ती है। ये देनवा है,..एक किंवदंती है कि भस्मासुर से बच कर भागते छिपते हुए जब जटाधारी भोलेनाथ इस दुर्गम पथ पर बढ़े चले आ रहे थे तब इस श्रम से उनके पसीने की जो धारा देह से निकल कर सतपुड़ा की तलहटी में समाई तो देनवा नदी बन बह निकली जिसका पीछा करते करते भस्मासुर पार्वती गुफ़ा तक पहुँच गया था और वहीँ उसे विश्वमोहिनी का स्वांग भरे विष्णु ने नृत्य की आकर्षक मुद्राओं से चकित कर अपना अनुसरण करने को बाध्य कर उसी का हाथ उसके सर पर रखवा कर भस्म करवा दिया था। ये अपने भोलेनाथ भी न इतने भोले हैं हर किसी की तपस्या पर मुग्ध होकर तत्काल ऑफर सहित वरदान देने वाले और इनकी इन वरदानों के बाँटने की उदारता से पार्वती जी अपनी गृहस्थी उठाये उठाये फिरती रहीं पर भारतीय पत्नियों की पुरानी खेप जैसे उन्होंने भी कभी उफ़ नहीं किया लाख मन मसोसा हो पर अधरों के कम्पन ने नहीं कहा कि भोले भंडारी अब तो ठहर जाओ। पर इस मामले में द्वारिकाधीश की रानियाँ बड़ी चतुर निकली,.. तुरन्त पति के हाथ से तीसरी मुट्ठी चावल की छीन ली,अरे ऐसे कैसे अपने मित्र सुदामा को सब दिए दे रहे हो मधुसूदन,.. हमाये भी तो बाल बच्चा आयें वे किते जैहें–
खैर,.ये तो किंवदन्ती है,.और ऐसी जाने कितनी ही किवदंतियाँ इन खूबसूरत वादियों में बिखरी पड़ी हैं,.हम तो देनवा के मुग्ध करने वाले सौंदर्य को निहारते चल रहे थे कि देनवा दर्शन का पॉइन्ट आ गया। यहाँ से देनवा 1000 फ़ीट की गहराई में कूदती फाँदती दौड़ती चलती है,इसका कोलाहल कानों में ऐसा रस घोलता है जैसे अल्हड़ चले पिय से मिलकर,..हर बार यहाँ रुककर यहाँ से देनवा को अपने साथ लिए जाती हूँ। शिवना क्षिप्रा और चम्बल के पास से होकर गुज़रते हुए मुझे नर्मदा पुकार लेती है,..और देनवा मुझमें ठिठक जाती है।
मैं कहीं भी रहूँ देनवा का कोलाहल और झरनों का संगीत मुझमें बजता रहता है।

धीरे धीरे हम वहाँ पहुँचते जा रहे हैं जहाँ के लिए निकले थे,..पचमढ़ी यहाँ से मात्र 5 किलोमीटर दूर रह जाती है। यहाँ जो खुशबू आ रही है उसके लिए हम 800 किलोमीटर दूर से यहाँ आये हैं। इस छोटे से गाँव में इतने आम्र तरु हैं कि इसका नाम बारी से बदलकर बारी आम रखना पड़ा है। यहाँ हम गाड़ी से उतर जाते हैं,..सामने एक रेस्ट हाऊस है,.जिसमें कोई चार पाँच लोग आराम से नहीं तो थोड़ी सी असुविधा के साथ तो रह ही सकते है। इसके सामने ही एक प्राथमिक शाला है क़रीब 30 बच्चे इसमें पढ़ते हैं।बहुत छोटा सा गाँव है जिसमे 50 घर भी नहीं,.घर क्या झोपड़ियाँ हैं पर कमाल की बनावट है,.स्कूल के गुरूजी कृपाल सिंह ठाकुर ने बताया इनमें बारिश का पानी अंदर नहीं रिसता जबकि घटाटोप बारिशें हुआ करती हैं,..इन्हीं वज़हों से पचमढ़ी की सालाना छुट्टियाँ गर्मियों में न होकर बारिशों में हुआ करती थीं,औसत बारिश 130 इंच प्रतिवर्ष होती थी।
बारीआम के ये औरत आदमी सब महुआ बीनते हैं,.इसी से कच्ची शराब बनाते हैं,,.बेचते भी हैं और खुद भी छककर पीते हैं,.आदिवासी हैं इनकी अपनी बोली अपने कानून अपने लिए जीने वाले लोग,.किसी के शासन के आधीन रहना इन्हें नहीं सुहाता।
ये आदिवासी गोंड़ हैं पर खुद को ठाकुर कहलाना पसन्द करते हैं।
राष्ट्रीय अभ्यारण्य के निकट रहते हुए बड़े जीवट वाले हो चले हैं, जंगली जानवरों के बीच से जंगल से सूखी लकड़ियाँ  बीन कर ले आते है,पशुओं को चरा लाते हैं।
पशु पालते हैं दूध बेचने पचमढ़ी जाते हैं। यहाँ आते ही रसीले आमों की खुशबू के साथ साथ एक याद भी ज़ेहन में कौंध गई यहीं के एक आदिवासी खुमानसिंह की बेटी थी लीला बड़ी साधारण सी असाधारण लड़की लीला आज से तीन दशक पहले पिता से झगड़ ली,..स्कूल में पढ़ेगी पचमढ़ी के माध्यमिक विद्यालय में अपनी बुआ को लेकर आ गई साथ लाई दो दोस्त एक जज़्बा और एक हौसला सुबह बारीआम से पैदल चलकर बस्ता टाँगे आती शाम को पैदल जाती। शैक्षणिक तो ज़्यादा हासिल नहीं कर सकी पर स्पोर्ट्स में स्टेट लेबल की धावक थी,. फिर वक़्त की आंधी ने लीला को कहाँ पहुँचाया पता नहीं? यहाँ अब खुमानसिंह का परिवार नहीं रहता,…मैं आमों से लदे झाड़ों से पूछती हूँ,.तुम्हारी मज़बूत शाखें और कोमल टहनियाँ चुप क्यों हैं? बताओ न कहाँ गई लीला? आमों  के टपकने की आवाज़ में लीला लीला सुनाई देता है,..पर लीला नहीं लौटती जाने कौन देश चली गई है,..मुझे आम के झाड़ों पर हुल्लड़ मचाते बन्दरों की टोलियाँ दिख जाती हैं पर लीला नहीं दिखती …. उसी ने तो इन आमों का चस्का लगवाया था,…वो स्कूल के बस्ते में किताबों के साथ कच्ची केरियाँ भी भर लाती थी,…हम जीरामन की पुड़िया घर से लाते थे,..आज जब भी कोई बच्ची केरी पकड़ती होगी,..मन्दसौर में मेरे मुँह में पानी आ जाता है। लीला ने जो केरियाँ खिलाई हैं,..वो अनूठी थीं,हम राह तका करते कब पकेंगी केरी,कब रस भरेगा इन हरी गिलसियों में और जब आम पक जाते टपकने लगते,…लीला हाथ से सिले झोले में नीचे टपके आम बीनकर रख लेती,..सुबह स्कूल आते समय उसके पास दो बस्ते होते हम उसके स्कूल पहुँचते ही झपट लेते झोला और रिसेस कैसे आती हम ही जानते थे,..अन्नू,शरीफा,नूरज़हाँ,कूका,सोना,प्रतिभा सब लीला के लाये आमों की दीवानी थीं,..किसी को याद नहीं रहता था 5 किलोमीटर पैदल इतना वज़न उठा कर आई लीला को भी इनमें से एक आम दे दें। पर लीला थी कि मुस्कुराती रहती और हमें आम चूसते देख तृप्त हो जाती।

हर साल गर्मियाँ आती हैं कच्ची केरी की चटनियाँ पिसती हैं,.पर वो चटखारे लीला की केरियों के नाम कर दिए अब नहीं मिलते।
आमों की एक से एक वैरायटी से फ्रीज़ भरा है,..पर बारीआम के वो टपका के आम जो बन्दरों,गिलहरियों चिड़ियों तोतों से बचकर हमें मिले उनका स्वाद,..जुबान में ही नहीं मन में भी स्थाई घर कर गया है। पर्यटक मुझे आश्चर्य से देख रहे हैं,..मैं आमों के स्वाद में लीला को महसूस कर रही हूँ,..मेरी आँखों से आंसुओं में बहकर लीला देनवा में डूब उतरा रही है।
बारीआम के आम अब यहाँ के गोंड़ टपकने नहीं देते कच्चे ही तोड़ लेते और फूस में पका लेते हैं,.अब ये पाल के आम पचमढ़ी तक नहीं पहुँचते,…सुना है कि सीधे ही बड़ी मण्डियों में भेजे जाते हैं,..अब स्वाद मुनाफ़े में बदल गया है लीला,.अब टपका के आम कहाँ जैसे तुम नहीं,मैं कितने पीछे चली गई जबकि दुनिया आगे दौड़ रही है,..मैं भी इसी दुनिया का एक हिस्सा हूँ लीला मुझे यहीं जीना है,..ये बन्दरों की टोलियाँ हमसी अभिशप्त नहीं,..ये नहीं खातीं कार्बाइड में पके आम हमारे हिस्से में ही है,.खरीदी हुई प्यास ये नहीं चुकाते मोल भूख प्यास का,..इन्होंने नहीं किया नुकसान जल,जङ्गल,ज़मीन का ये पाप तो हमारे माथे,…………………….आखिर हम मनुष्य जो ठहरे। मुझे अक़बर हैदरी की याद आ रही यहाँ–

खुदाबन्द मेरी गुमरहियों को दरगुज़र फरमा।
मैं उस माहौल में रहता हूँ,जिसका नाम दुनिया है।

आरती तिवारी
(लेखिका के अपने विचार हैं।)

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