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प्रेम की चिट्ठियों ……… तुम्हारे शब्द!

कविता

प्रेम की चिट्ठियों
तुम्हारे शब्द
मेरे रक्त का वेग हैं
जो मेरे भीतर
जन्मातर तक
प्रवाह होते रहेंगे
मष्तिस्क की लकीरों से
आँखों की झाइयों तक का सफर
तय किया है साथ में हमनें
तुम पुरानी नहीं होती
वर्ष बीत जाते बस
बीते वर्षों में
कुछ यादों ने
कँपते हाथों में
जान डाल दी
देखो साँस चल रही
बोल नहीं निकले तो क्या
वेंटिलेटर पर हूँ
चिट्ठियां थामें
ये क्या!
बँधी मुट्ठियाँ खुल गयी
जीवन के अंतिम वक्त में
चिट्ठियां छूट रही
साँस टूट रही
मेरी आँखें बंद हो रही
तुम्हारे अक्षर धुल रहे
अब लगता पुरानी हो जाएगीं चिट्ठियां
सुनो रोना मत
मेरे जाने के बाद
आखिरी चिट्ठी में
तुम रोये थे
कह गये थे रोना मत
मैं रो नहीं रही
समय अब मेरा नहीं रहा ना
क्योंकि एक समय बित जाने पर
मिट जाता है भूतकाल
भविष्य देखा जाता है
प्रेम
चिट्ठियां
यादें
पुराने समय की बात हो चली अब
इन दिनों डाकिया जो नहीं आता ।


                                                      – दीप्ति शर्मा

                            ( लेखिका वरिष्ठ कवियित्री है।)

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