Article | Story | Opinion

पलायन दर्द !

जिंदगी संवारने की बात थी तो घर छोड़कर आए थे… जिंदगी पर आफत आई तो पैदल ही घर वापस चल दिए… लंबी सड़को का गुमान था खुद पर…. लेकिन मजदूरों ने पैदल चलकर ही नाप दिया सड़कों का गुमान…आंखों का दर्द आंसू बनकर छलक रहा है….ये दर्द किसी की जिंदगी छीन रहा है….तो मंजिल पर पहुंचने से पहले कईयों का हौसला तोड़ रहा है।


गांवों में हिंदुस्तान बसता है शहरों की नस्ल ये कितना जानती है ?.. हिंदुस्तान के गांव में रहने वाले करीब 50 करोड़ लोग ऐसे हैं.. जो दो वक्त की रोजी- रोटी के लिए अपना गांव छोड़कर दूसरे शहरों का रूख करते हैं… इनमें खेतिहर मजदूर भी है और वो मजदूर भी हैं.. जो दूसरी तरह के काम करते हैं.. एक नजर इस सच्चाई पर डाल लें तो आपको पता चल जाएगा कि सड़कों पर इतना हुजूम इतनी लंबी कतारों क्यों हैं ?


देश में 58 फीसदी आबादी गांव में रहती है.. जो ज्यादातर खेती बाड़ी करती है.. ज्यादातर लोग कमाई के लिए शहरों का रूख करते हैं.. लेकिन लॉकडाउन ने इनकी जिंदगी पर लॉकडाउन लगा दिया.. मालिकों ने मूंह फेर लिया.. सेठों ने हाथ खींच लिए.. जिंदगी, मौत से बदतर लगने लगी तो मजदूरों ने शहरों को छोड़ गांवों का रुख कर लिया
भूखे.. नंगे पैर.. बिना किसी सहारे के पैदल चल दिए. क्या महिलाएं..क्या पुरुष और क्या बच्चे? हौसला इतना ज्यादा की खाकी वर्दी का भी दिल भर आया.. मासूम के नंगे पैर देखकर रहा नहीं गया.. तो अपने हांथों से नन्हें पैरों को चप्पल का सहारा दे दिया.. लुधियाना से झांसी जाने के लिए बीमार बेटे को लेकर 15 दिन से पैदल चल रहे इस मजदूर का दर्द झकझोर कर रख देने वाला.. सियासत को आईना दिखाने वाली ये तस्वीर कानपुर के रामादेवी में दिखाई पड़ी.. जहां 15 दिन से भूखे- प्यासे चल रहे मजदूर का सफर अभी पूरा नहीं हुआ..
तो सूरत में घर जाने से रोके जाने पर मजदूरों ने हंगामा कर दिया.. ये गुस्सा है उन जिम्मेदारों के खिलाफ जिन्होंने चुनावी मौके पर उनके पेट भरने की जिम्मेदारी ली थी.. लेकिन भूख कब लगेगी ये कौई नहीं जानता.. क्योंकि दिल्ली के मजदूरों को खाने खिलाने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर थी उन्होंने राशन खत्म होने नोटिस चस्पा कर दिया.. हाथों में राशन कार्ड की फोटो लेकर खड़े महिला मजदूर अपना दर्द कहें तो किससे कहें ?.. क्योंकि जिम्मेदारों ने तो अपने फोन ही बंद कर दिए
कहतें है जिंगदी के सफर का अंत मौत से ही होता है.. लेकिन से मौत से पहले मजदूर पलायन का दर्द झेल रहे हैं.. पैदल चल रहे हैं.. घरों की ओर लौट रहे हैं.. क्योंकि जिन मालिकों के इन्होंने ऊंचे- ऊंचे घर बनाए थे.. कभी इनकी फैक्ट्रियों को चलाने के लिए अपना खून- पसीना एक किया था.. अब उन्होंने भी अपना मुंह मोड लिया है.. जिसके बाद घर लौटने के सिवाए इनके पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है
सड़कों पर परिवार के साथ फुटपाथ पर बैठे हुए इन मजदूरों को बस घर जाना है.. गाड़ी नहीं, घोड़ा नहीं… आलीशान कार नहीं बस भरोसा है तो पैरों पर क्योंकि भरोसे का टूटना क्या होता है.. इनसे बेहतर कोई नहीं जानता, ये जितने खुद्दार हैं उतने ही समझदार भी है.. सरकार से आज भी इन्हें कोई शिकवा नहीं है यही वजह है कि सरकार की बात सुनने के लिए साइकिल पर रेडियो लागाकर अपने सफर को पूरा कर रहे हैं.. ये सरकार की सुन रहे हैं.. लेकिन सरकार इनकी कब सुनेगी ये बड़ा सवाल है।


ऐसा नहीं कि इन्हें कोरोना से डर नहीं लगता लेकिन जब पेट की भूख खाना मांगती है.. तो खाना मयस्सर न होने पर घर लौटना मुनासिब लगता है… कोरोना जान के लिए जोखिम भरा है.. लेकिन क्या करें भूख उससे ज्यादा जानलेवा है.. इंतजाम ऐसे हैं कि सफर करके किसी तरह घर पहुंच गए तो क्वरनटाइंन के लिए अस्पताल तक पहुंचने के इंतजाम भी नहीं है.. पैदल ही घर का सफर तय किया अब पैदल ही अस्पताल चेकअप के लिए भी जाना है.. मदद भी मिलती है तो आधी- अधूरी जो न इधर का रहने देती है और न उधर का मजदूरों का दर्द कोई नया नहीं है..बस फर्क इतना है कि ये दर्द कभी गांव में नजर आता है.. तो कभी शहरों से पलायन की शक्ल में .. जो सियासत को आईना दिखाता है कि मर भी गए तो गम नहीं.. मर कर भी आपके काम आ जाएंगे।

विनीत शर्मा ( कानपुर )

( लेखक सीनियर प्रोड्यूसर है।)

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Close