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जम्मू-कश्मीर: राज्यपाल शासन हुआ लागू, डीजीपी ने कहा कि अब आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन ज्यादा आसान

एनएन वोहरा 2008 में राज्यपाल बने थे, उनका कार्यकाल 25 जून को खत्म होना है, लेकिन यह आगे बढ़ सकता है। अमरनाथ यात्रा 26 अगस्त तक चलेगी, इस पर आतंकी हमले का खतरा है।

दीप्ति सचदेवा
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में पीपल्स डेमोक्रैटिक पार्टी (पीडीपी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की गठबंधन सरकार गिरने के 24 घंटे के अंदर राज्यपाल शासन लग गया है। बुधवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राज्य में राज्यपाल शासन को अपनी मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में अगले छह महीने की अवधि के लिए राज्यपाल शासन लागू हो गया है।

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के इस्तीफे के बाद राज्यपाल एनएन वोहरा ने राष्ट्रपति को भेजे गए एक पत्र में राज्य में केन्द्र का शासन लागू करने की सिफारिश की थी। इसकी एक प्रति केन्द्रीय गृह मंत्रालय को भी भेजी गई थी। राष्ट्रपति ने वोहरा की सिफारिश पर मुहर लगा दी है, जिसके बाद तत्काल प्रभाव से प्रदेश में राज्यपाल शासन लागू कर दिया गया है।

बताया जा रहा है कि वे अमरनाथ यात्रा खत्म होने तक गवर्नर बने रह सकते हैं। अमरनाथ यात्रा 28 जून से 26 अगस्त तक चलेगी। उधर, राज्य के डीजीपी एसपी वैद ने कहा है कि राज्यपाल शासन लगने से आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाना काफी आसान हो जाएगा।

राज्य में पिछले 10 साल में यह चौथी बार राज्यपाल शासन लगा है। पीडीपी और भाजपा के बीच सवा तीन साल पहले गठबंधन हुआ था। भाजपा ने मंगलवार को पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से गठबंधन तोड़कर महबूबा मुफ्ती सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। कांग्रेस और पीडीपी ने एकदूसरे के साथ गठबंधन की संभावना से इनकार किया है। वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला ने भी किसी गठबंधन की संभावना से इनकार किया है।

सीजफायर से आतंकियों को फायदा मिला: डीजीपी
डीजीपी एसपी वैद ने बताया कि कश्मीर में रमजान के दौरान आतंकियों के खिलाफ सर्च ऑपरेशन पर रोक लगाई गई थी। आतंकियों को इससे काफी फायदा मिला है। इस वजह से आतंकी घटनाओं में इजाफा हुआ, लेकिन अब यह रोक हट गई है। आगे आतंकियों के खिलाफ और भी मजबूत ऑपरेशन चलाए जाएंगे। राइजिंग कश्मीर अखबार के संपादक शुजात बुखारी की हत्या पर वैद ने कहा कि हमने एसआईटी का गठन किया है। पुलिस इस मामले को जल्द ही सुलझा लेगी। आर्मी के शहीद जवान औरंगजेब के बारे में उन्होंने कह कि हत्या करने वाले आतंकियों की पहचान हो गई है। जल्द ही हम उन तक पहुंच जाएंगे।

जम्मू-कश्मीर में अब तक 11 चुनाव हुए, राज्य ने 8 बार राज्यपाल शासन देखा

1957-1977 : पहली बार 1957 में चुनाव। नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) को 75 में 68 सीट मिली। बख्शी गुलाम मो. वजीर-ए-आजम बने। 62 में भी नेकां जीती। 1967-72 में कांग्रेस जीती। 1975 में इंदिरा का नेकां के शेख अब्दुल्ला से करार हुआ। कांग्रेस के मीर कासिम ने अब्दुल्ला के लिए कुर्सी छोड़ दी।

1977-1982 : 1977 में कांग्रेस ने समर्थन वापस लेकर अब्दुल्ला सरकार गिराई। पहली बार राज्यपाल शासन लगा। 1977 के चुनावों में नेकां जीती और शेख अब्दुल्ला दोबारा मुख्यमंत्री बनाए गए। 1982 में शेख अब्दुल्ला के निधन पर बेटे फारूक अब्दुल्ला सीएम बने। कांग्रेस की मदद से अब्दुल्ला के बहनोई गुलाम शाह ने सरकार गिरा दी। शाह दो साल सीएम रहे। 6 मार्च, 1986 से 7 नवंबर, 1986 तक राष्ट्रपति शासन रहा।

1986-2002 : 1986 में हुए चुनावों में फिर नेकां जीती और फारूख सीएम बने। 1990 में जगमोहन को राज्यपाल बनाने के विरोध में इस्तीफा दे दिया। 1996 तक राज्यपाल शासन रहा। 1996 के चुनाव में फिर नेशनल कॉन्फ्रेंस को सफलता मिली। फारूख तीसरी बार सीएम बने।

2002-2018 : 2002 चुनाव में कांग्रेस-पीडीपी की सरकार बनी। मुफ्ती सईद सीएम बने। 3 साल के बाद कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद सीएम बने। पीडीपी ने सरकार गिरा दी। 2008 में हुए चुनावों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। नेकां-कांग्रेस की सरकार बनी। उमर अब्दुल्ला सीएम बने। 2014 में चुनाव हुए। 2015 में भाजपा-पीडीपी में गठबंधन। पीडीपी के मुफ्ती सईद फिर सीएम बने। उनके निधन के बाद महबूबा राज्य की पहली महिला सीएम बनी।

गठबंधन तोड़ने की दो वजह जो भाजपा ने बताईं
राम माधव ने कहा, ‘‘घाटी में आतंकवाद, कट्टरपंथ, हिंसा बढ़ रही है। ऐसे माहौल में सरकार में रहना मुश्किल था। रमजान के दौरान केंद्र ने शांति के मकसद से ऑपरेशंस रुकवाए। लेकिन बदले में शांति नहीं मिली। जम्मू और कश्मीर क्षेत्र के बीच सरकार के भेदभाव के कारण भी हम गठबंधन में नहीं रह सकते थे।’’

ऑपरेशन ऑलआउट को लेकर भी भाजपा-पीडीपी में था मतभेद 
पहली- रमजान के दौरान सुरक्षाबल आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन रोक दें, इसे लेकर भाजपा-पीडीपी में मतभेद थे। महबूबा के दबाव में केंद्र ने सीजफायर तो किया लेकिन इस दौरान घाटी में 66 आतंकी हमले हुए, पिछले महीने से 48 ज्यादा। । दूसरी- पीडीपी चाहती थी कि केंद्र सरकार हुर्रियत समेत सभी अलगाववादियों से बातचीत करे। लेकिन, भाजपा इसके पक्ष में नहीं थी।

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