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उत्तर प्रदेश : IAS-IPS आमने-सामने, प्रमुख सचिव और डीजीपी के पास पहुंचा मामला

उत्तरप्रदेश प्रशासनिक व्यवस्था में अराजकता कई मौके पर साफ दिखाई पड़ती है. यहां के कुछ जिले में डीएम और एसपी अपने अधिकारों को लेकर भिड़ते दिखाई पड़ रहे हैं

एसएसपी के पत्र का शासन ने संज्ञान लिया है और ठोस कदम व कार्रवाई की जाएगी।
एसएसपी वैभव कृष्ण ने इस मामले में प्रमुख सचिव गृह अरविंद कुमार को एक पत्र लिखा है।

हिमानी बाजपेई शुक्ला
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में एक बार फिर आईएएस और आईपीएस आमने-सामने हैं। मामला गाजियाबाद का है। दरअसल, थानाध्यक्षों के तैनाती को लेकर डीएम गाजियाबाद रितु माहेश्वरी ने एसएसपी वैभव कृष्ण के एक पत्र लिखते हुए पूछा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए, जिसके बाद मामला बढ़ गया। एसएसपी वैभव कृष्ण और जिलाधिकारी ऋतु माहेश्वरी के बीच पत्राचार भी चला और एसएसपी साहब ने जिलाधिकारी द्वारा लिखे गए शब्दों पर घनघोर आपत्ति भी जता दी। इतना ही नहीं एसएसपी वैभव कृष्ण ने होम डिपार्टमेंट के प्रमुख सचिव अरविन्द कुमार और प्रदेश के डीजीपी ओ.पी. सिंह को पत्र लिखकर अपने तबादले की मांग की है। जाहिर है शीर्षस्थ अधिकारियों के बीच तनातनी से एसएसपी को अंदेशा है कि बेहतर कानून व्यवस्था बहाल कर पाने में बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

क्या था मामला
आपको बता दें कि ये मामला तब उठा जब गाजियाबाद के एसएसपी वैभव कृष्ण ने काफी संख्या में दरोगाओं की इधर से उधर पोस्टिंग की और नए थानेदारों की भी तैनाती की. इसके बाद गाजियाबाद की जिलाधिकारी रितु माहेश्वरी द्वारा एसएसपी से उनकी प्रतिक्रिया मांगी। उन्होंने एसएसपी से लिखित में सवाल पूछा कि क्यों न आपके खिलाफ कार्रवाई की जाए, क्योंकि आप नियमों को ताक पर रखकर दरोगाओं और थानेदारों की तैनाती कर रहे हैं। इसी के बाद से दोनों के बीच विवाद बढ़ गया।

फेरबदल को लेकर पहले भी हुआ था विवाद
आपको बता दें कि पिछले महीने गौतमबुद्धनगर के एसएसपी डॉ अजय पाल शर्मा और यहां के डीएम बीएम सिंह के बीच भी तना-तनी सामने आई थी। डीएम ने पत्र लिखकर एसएसपी को से कहा था कि जिले में पुलिसकर्मियों की तैनाती से पहले जिलाधिकारी से अनुमोदन कराना जरूरी है, जो नहीं कराया गया था।

प्रमुख सचिव की चिट्ठी है फसाद की जड़ –
वैसे इस फसाद के पीछे प्रमुख सचिव द्वारा लिखी गई वो 9 मई की चिट्ठी है जिसमें पुलिस विभाग में तबादले को लेकर एसएसपी द्वारा जिलाधिकारी से लिखित सहमति की बात कही गई थी लेकिन आईपीएसए एसोसिएशन के विरोध बाद 24 मई को शासन द्वारा एक और चिट्ठी निकाली गई जिसमें लिखित आदेश की बात न कह कर कंसल्टेशन की बात कही गई थी। जाहिर है कंस्लटेशन शब्द का अभिप्राय जिलाधिकारी और एसएसपी अपने-अपने तरीके से निकालने में उलझ पड़े हैं। ऐसे में शासन व्यवस्था में अराजकता साफ तौर पर देखी जा सकती है।

यही हाल कुछ दिनों पहले नोएडा में भी दिखाई पड़ा था जब दस पुलिसकर्मियों के तबादले की फाइल को जिलाधिकारी बी.एन. सिंह ने ये कह कर लौटा दिया था कि उनकी सहमति लिए बगैर तबादले कैसे किए गए। ध्यान रहे इन सभी पुलिसकर्मियों की तैनाती नई जगह पर हो चुकी थी लेकिन जिलाधिकारी बी.एन. सिंह की आपत्ति के बाद फाइल लौटा दी गई और प्रशासन में एक तरह से अराजकता वाली स्थिति हो गई थी।

वैसे कुछ आईपीएस अधिकारी मानते हैं कि जिले में जिलाधिकारी को कानूनी वैधता जरूर है लेकिन प्रैक्टिस के मुताबिक जिले का कप्तान ही पुलिस में तबादले का निर्णय लेता है जिसे औपचारिक या अनौपचारिक तौर पर डीएम की सहमति मिलती रही है।

यूपी में कार्यरत पुलिस के एक बड़े अधिकारी ने फ़स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहा, ‘प्रैक्टिस भी धीरे-धीरे कानून का स्वरूप ले लेती है और इसमें किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ प्रशासनिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। ये नियम काफी पुराना है, जिसे फिर से रिट्रीट किया गया है और इसको दोनों ग्रुप अपने अपने ढंग से पिक कर अलग-अलग मतलब निकाल रहे हैं।

पहले भी होती थी समस्या, लेकिन सामने नहीं आती थी
पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह के मुताबिक सबकुछ डीएम और एसपी के बीच संबंधों पर निर्भर करता है. पहले भी ये समस्या थोड़ी बहुत आती थीं पर इतनी मीडिया नहीं होने की वजह से लोगों तक बात नहीं पहुंच पाती थी. वो कहते हैं, ‘डीएम और एसपी को इस समस्या का निदान एक साथ सुलझाना चाहिए और मीडिया में आए इस विवाद से बचना चाहिए. वैसे इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का साफ निर्देश है कि डीएसपी रैंक के अफसर तक का तबादला पुलिस अधिकारी स्वतंत्र रूप से कर सकेंगे लेकिन राज्य सरकार ने इसे अभी तक कार्यान्वित नहीं किया है।’

वहीं प्रदेश में कार्यरत एक आईएएस अधिकारी के मुताबिक, ‘नियम के मुताबिक जिलाधिकारी का रोल सुपरवाइजरी होता है और शासनादेश भी जिले में कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार जिलाधिकारी को मानता है, लेकिन समस्या नियम को लेकर नहीं होती है बल्कि संवादहीनता की वजह से ईगो की टकराहट समस्या की वजह बनती है।’

अराजकता का माहौल सिर्फ आईएएस और आईपीएस के बीच अधिकार की लड़ाई को लेकर ही नहीं है बल्कि पार्टी और अधिकारी के बीच तनातनी भी शासन व्यवस्था में अराजक स्थिति पैदा करने के लिए काफी हैं. पिछले दिनों मेरठ के कमिश्नर प्रभात कुमार इसलिए हटाए गए क्योंकि उन पर आरोप जनता के प्रतिनिधियों के साथ बुरे बर्ताव का था. हैरानी की बात यह थी कि सत्ताधारी दल के लोग ही उनके खिलाफ सड़क पर उतर आए थे।

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