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‘गंगा की सफाई’ के मुद्दे पर अनशन कर रहे पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल का निधन

गंगा की सफाई और अवैध खनन के खिलाफ जून 2018 से अनशन कर रहे पर्यवरणविद जीडी अग्रवाल का ऋषिकेश में निधन हो गया। 112 दिनों से छोड़ रखा था खाना-पीना।

मनप्रीत कौर
नई दिल्ली। गंगा में प्रदूषण बहुत बड़ा मुद्दा है और इसको लेकर बातें और दावे तो तमाम होते हैं लेकिन बहुत कम लोग ही इस अहम मुद्दे को लेकर संवेदनशील हैं। गंगा को प्रदूषण रहित बनाने के लिए 112 दिनों से उपवास कर रहे मशहूर पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल का गुरुवार (11 अक्टूबर) को निधन हो गया। बीते 22 जून से उन्होंने खाना-पीना छोड़ रखा था। वह 86 वर्ष के थे। उन्हें स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के नाम से भी जाना जाता था। जीडी अग्रवाल का गंगा को लेकर प्रेम सबको पता है और वो इस मुद्दे को लेकर काफी समय से संघर्षरत थे।

गंगा मुद्दे पर वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिख चुके थे लेकिन लंबे समय से जारी अनशन के चलते हरिद्वार से दिल्ली लाते वक्त रास्ते में उनका निधन हो गया। वह आईआईटी कानपुर में फैकल्टी और भारतीय केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य भी रह चुके थे। वर्तमान में वह संन्यासी का जीवन जीते हुए गंगा को बचाने की मुहिम में जुटे थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बीते मंगलवार (9 अक्टूबर) को उन्होंने जल भी त्याग दिया था, जिसके चलते बुधवार को प्रशासन ने जबरन ऋषिकेश अस्पताल में भर्ती कराया था। वह हरिद्वार के मातृसदन आश्रम में अनशन कर रहे थे।

इस दौरान वे केवल पानी और शहद का ही ले रहे थे। मीडिया सूत्रों के मुताबिक कहा जा रहा है कि प्रोफेसर जीडी अग्रवाल को दिल का दौरा पड़ा था, जिसके वजह से उनका निधन हो गया। वे गंगा नदी को अपनी माँ मानते थे।

हरिद्वार से सांसद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने उनसे आग्रह किया था कि वह जल न त्यागें लेकिन पूर्व प्रोफेसर ने उनकी बात नहीं मानी। रिपोर्ट्स के मुताबिक केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने तीन बार केंद्रीय मंत्री उमा भारती को बतौर प्रतिनिध भेजकर अग्रवाल से अनशन खत्म करने का आग्रह किया था। उमा भारती मातृसदन आश्रम में उनसे मिली थीं। तमाम कोशिशो के बावजूद स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद ने उपवास नहीं छोड़ा और गडकरी से फोन पर कहा था कि एक्ट लागू होने तक अनशन जारी रहेगा।

सोशल मीडिया पोस्ट्स में कुछ लोगों की पोस्ट्स में देखा गया है कि जीडी अग्रवाल स्वयं को भागीरथ का वंशज मानते थे और उपवास को मां गंगा के लिए तपस्या का नाम देते थे। वह गंगा प्रदूषण, उसमें होने वाले अवैध खनन जैसे मुद्दों पर अनशन कर रहे थे। इसी साल फरवरी में उन्होंने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर गंगा के लिए अलग से कानून बनाने की मांग की थी। वह इसस पहले भी आमरण अनशन कर चुके थे। 2012 में आमरण अनशन पर बैठे अग्रवाल ने सरकार की ओर से मांगें माने जाने का आश्वासन मिलने के बाद अनशन तोड़ दिया था। उस दौरान भी उनकी तबीयत बिगड़ गई थी और इलाज के लिए उन्हें वाराणसी लाया गया था।

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