Article | Story | Opinion

कोई मजाक नही बनाएगा !

भूल जाती हूँ


भूल जाती हूँ मैं भी अक्सर
फोन घुमाने के बाद
किसको मिलाया ! !
आवाज कानों में पड़ते ही
वापस यथार्थ में लौट आती हूँ।

भूल जाती हूँ अक्सर
किचेन से फ्रिज तक आते – आते
क्या लेना है , क्यों खोला फ्रिज!!
वापस उसी जगह जा कर
याद कर आती हूँ पुनः!

भूल जाती हूँ अक्सर
मैं कौन हूँ
क्या करने आई हूं
वापस अपने होने के
अहसास को जीने के लिए
पलटती हूँ कुछ पन्ने
जीवन के उन क्षणों से
जिन्हें होम कर दिया
कभी किसी के लिए

भूल जाती हूँ अक्सर
लोग बहुत कुछ कह जाते है
दिल दुःखा जाते हैं
चुभे हुये नश्तरों को
जली कटी बातों को
साथ ही वो भी
जो कहीं बहुत जरूरी था
भूल जाती हूँ

मेरे अपने मेरे प्यारे
जिन्हें मैं बहुत प्यार करती हूँ
भूल जाती हूँ अक्सर उनको भी !!
स्वच्छंद जीने के लिए !!!

अन्नपूर्णा बाजपेयी ( रचनाकार)
कानपुर

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Close