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!! इच्छा की डिबिया !!

च्छा की डिबिया से
निकली डोर
बंधी कन्नी
उड़ा एक ख़्वाब फिर
गिर पड़ा था
अभी…
ज़रा देर पहले –
बर्फ़ के गोले संग
लथ – पथ हुआ पड़ा है
मिट्टी में उधर…
कभी ताज्जुब की
कॉमिक्स में खुले मुंह
कभी जीतने की ज़िद
किसी गेम को
और
हारकर बदलना पैंतरा
तमतमाकर दौड़ पड़ना
कि याद आ गए हों
बिल्ली के नन्हे बच्चे
सोचना ख़ुद ही ख़ुद में
सारा जहां है मुझसे
मान लेना कि
मेरी ही चलती है
हुकूमत
कितना कुछ
भरा – धरा
नहीं हुआ खाली…
कितना कुछ अभी
बचा है डिबिया में
वो रूठता है
आप मान जाता है
रोते हुए हंस पड़ता है
और
हंसते – हंसते रो पड़ता है
अभी तो जलाने हैं
कितने ही जुगनू
उड़ानी हैं
कितनी ही पतंगें
काटने हैं
कितने ही बादल
उगाना है सूरज
रोज़ – रोज़
दिल मे डिबिया है
एक घर है उसका
जहां रहता है
बचपन
टेढ़ी – मेढ़ी सी लगी है
नेमप्लेट
लिखा है नाम जिसपर
‘ज़िन्दगी’ ।

                                         – अर्चना गौतम मीरा

विज्ञान वर्ग से फिर भी साहित्य व संगीत से गहरी जुड़ी। विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में कहानियां, कविताएं व्यंग्य व लघुकथाएं प्रकाशित।

कविता संग्रह ‘पिरामिड : तिलिस्म और तितली’ शीघ्र प्रकाश्य।

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