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अपना दल में मची खलबली, रमेश वर्मा को वाराणसी जिला अध्यक्ष पद से हटाने’ से कार्यकर्ता हुए नाराज

सत्ता की सूली पर कार्यकर्ता और विचार "कार्यकर्ताओं में आक्रोश"

जितेंद्र कुमार अग्रहरि
वाराणसी। वाराणसी के रमेश वर्मा को विगत छः माह पहले अपना दल (कृष्णा गुट) जिला अध्यक्ष के रूप में बड़ी जिम्मेदारी मिलने से जहां कार्यकर्ताओं में उत्साह था, वहीं अब उन्हीं कार्यकर्ताओं में आक्रोश पनप रहा है। अपना दल के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया की जिले मे भले ही जिला अध्यक्ष अपना दल का कुनबा बढा रहे हो वही विगत 2 जुलाई को अपना दल संस्थापक डा. सोनेलाल पटेल की जयंती को सफलता पूर्वक आयोजन करने के बावजूद अपना दल हाईकमान बिना किसी कारण नोटिस स्पष्टीकरण दिए दल के जिलाध्यक्ष रमेश वर्मा को हटाकर उनके साथ नाइंसाफी किया जिस बाबत स्थानीय कार्यकर्ता नाराज चल रहे है। नाराज़ कार्यकर्ताओ ने कहा की हमारी विचारधारा और हमें गाली देने वाले नेताओं का हमारे दल मे स्वागत हो रहा है। उनको प्रमोशन दिया जा रहा है। अपना दल में पहले ऐसा नही होता था। 

एक वरिष्ठ पूर्व पदाधिकारी ने कहा यदि कार्यकर्ताओं की ऐसे ही अनदेखी चलती रही तो जल्द ही एक बडा खेमा बागी हो सकता है। नाराज कार्यकर्ताओं को देखकर तो यही लगता है कि अपना दल के भीतर सब कुछ ठीक नही चल रहा है। जो पार्टी और नेता दोनो के लिए ठीक नही हाई कमान यदि अपने गृृह नगर में कार्यकर्ता और संगठन को सम्भाल सकें तो यह उनके लिए बड़ी चुनौती होगी। अपना दल युवाओं को ठगने का कार्य कर रही है. जब जरूरत होता है, इस्तेमाल करती है. फिर दर किनार कर देती है. नाराज कार्यकर्ताओ ने कहा कि हमारे नेता रमेश वर्मा है. उनके साथ अपना दल हाई कमान ने उनको बिना किसी कारण वाराणसी जिला अध्यक्ष पद से हटाकर न्याय नहीं किया है.

सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार गुप्ता ने बताया कि चुनावों की आहट के साथ ‘आया राम-गया राम’ का खेल शुरू हो जाता है। इस खेल में तमाम दूसरे दलों के नेताओं को नया बसेरा ढूंढना रहता है, ऐसे में निष्ठावान और समर्पित कार्यकर्ताओं की बलि चढ़ा दी जाती है। कार्यकर्ताओं को लगता है कि 5 वर्षों तक सड़कों पर लड़ने के लिए वो थे, वहीं अब जब टिकट पद की बारी आई तो उन्हीं नेताओं के हाथ जा रही है जिनसे वो लड़ते आए हैं। 

राजनीतिक दल भले ही इस बात से उत्साहित हों कि उनकी पार्टी में आने वालों ने पार्टी दफ्तर के बाहर लाइन लगा रखी है, लेकिन इससे विचारवान, निष्ठावान कार्यकर्ताओं के बगावत करने का खतरा भी मंडराता रहता है। ऐसा नहीं कि यह सिर्फ उत्तरप्रदेश में ही लागू होता है। इसका उदाहरण अन्य राज्यों में हमेशा से देखने को मिलता है। 

अगर राजनीतिक दलों का सपना सिर्फ सत्ता पाने का है तो उनका कोई विचार नहीं होना चाहिए। अगर कार्यकर्ता की निष्ठा का गला घोंटना है तो फिर उन्हें तैयारी का आश्वासन नहीं देना चाहिए। बड़ी मुश्किल होती है कार्यकर्ता जोड़ने की। ऐसे में अवसरवादी या फिर दलबदलुओं पर मेहरबानी ठीक नहीं है।

राजनीतिक दलों का सत्ता में पहुंचने हेतु प्रयास करना या रणनीति बनाना अस्वाभाविक नहीं होता। लेकिन यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि दलबदलुओं की वजह से सत्ता नसीब होती है। इसकी एक सीमा हो सकती है। लेकिन कोई पार्टी बड़ी तादाद में दलबदलुओं को चुनाव में उतार दे तो यही समझा चाहिए कि उसका अपनी विचारधारा व काडर पर विश्वास नहीं है। इसके लिए पार्टी 5 वर्ष तक संघर्ष करने वाले अपने ही कार्यकर्ताओं की अवहेलना करती है। इसका नुकसान ही अधिक होता है।

हालांकि इसका साइड इफेक्ट दिखने लगा है। जमीनी स्तर पर सालों से कार्य कर रहे कार्यकर्ता इस फैसले से नाराज हैं। वहीं अपना दल के वरिष्ठ नेता पार्टी के विस्तार का नाम देकर सारी बातों को दरकिनार कर रहे हैं।

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